चातुर्मास
चातुर्मास आषाढ़ की देवशयनी एकादशी से कार्तिक की देवउठनी एकादशी तक चार मास की पवित्र अवधि है, जब विष्णु शयन में माने जाते हैं। इसमें विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ आरंभ नहीं किए जाते।
इस वर्ष की तारीखें · दिल्ली
- 2026 शनिवार, 2026-07-25 (देवशयनी एकादशी) → शुक्रवार, 2026-11-20 (देवउठनी एकादशी)
- 2027 बुधवार, 2027-07-14 (देवशयनी एकादशी) → बुधवार, 2027-11-10 (देवउठनी एकादशी)
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अर्थ और तिथियाँ
शब्द चतुर (चार) और मास से बना है। चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल एकादशी — देवशयनी या हरिशयनी — से शुरू होता है, जब विष्णु क्षीरसागर में शेष पर योगनिद्रा में जाते हैं, और कार्तिक शुक्ल एकादशी — देवउठनी या प्रबोधिनी — पर समाप्त होता है, जब वे जागते हैं। बीच के चार चांद्र मास श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक हैं; अधिक मास वाले वर्ष में अवधि पाँच मास की हो जाती है।
Hastro आपके शहर के लिए सूर्योदय की तिथि से सटीक तारीखें निकालता है; इस वर्ष की तारीखें ऊपर हैं।
क्या किया जाता है
यह संयम की ऋतु है: अनेक लोग चार मास कोई एक भोजन छोड़ते हैं, एकादशी व्रत अधिक कड़ाई से रखते हैं, भागवत या रामायण पढ़ते हैं और दान करते हैं। साधु यात्रा रोककर एक स्थान पर रहते हैं — यही जैन और बौद्ध वर्षावास का मूल है।
क्या वर्ज्य है
विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, उपनयन और बड़े निर्माण का आरंभ चातुर्मास में नहीं होता, क्योंकि ऐसे आरंभों को पवित्र करने वाले देव विश्राम में हैं। ऋतु के पर्व — गुरु पूर्णिमा, नाग पंचमी, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दशहरा और दीपावली — इसी में पड़ते हैं और अवश्य मनाए जाते हैं।
Hastro का मुहूर्त खोजक गृह प्रवेश, सगाई और मुंडन के लिए चातुर्मास को वर्जित मानता है: ऐसी तारीखों के लिए वह विकल्प देने के बजाय बताता है कि कोई पारंपरिक मुहूर्त नहीं है। वाहन खरीद, व्यापार आरंभ और यात्रा अधिकतर सूचियों में चातुर्मास से प्रतिबंधित नहीं हैं।
FAQ
इस वर्ष चातुर्मास कब समाप्त होगा?
कार्तिक की देवउठनी एकादशी को; आपके शहर की सटीक तारीख ऊपर है। द्वादशी को तुलसी विवाह होता है और विवाह-ऋतु खुलती है।
क्या चातुर्मास में गृह प्रवेश हो सकता है?
पारंपरिक मुहूर्त सूचियाँ नहीं कहती हैं। कुछ परिवार पूजा के साथ साधारण प्रवेश करते हैं और विधिवत गृह प्रवेश देवउठनी एकादशी के बाद रखते हैं।
क्या चातुर्मास हर क्षेत्र में एक-सा है?
अवधि एक है; व्रत की प्रथाएँ भिन्न हैं। महाराष्ट्र और गुजरात इसे प्रमुखता से मानते हैं, दक्षिण एकादशी व्रतों और कार्तिक अनुष्ठानों से।
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